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रविवार, 20 मई 2012

कृष्ण लीला ……भाग 49




जैसी क्रीडा मनमोहन
ग्वालों संग करते थे
हे राजन अब उसका वर्णन करता हूँ
जब ग्रीष्म ऋतु उठान पर होती है
ज्येष्ठ आषाढ़ केमास में 
जीव दग्ध होते हैं
सारा संसार व्याकुल होता है
तब भी वृन्दावन में तो
वसंत ऋतु सा सुख बहता है
कहीं कोयल कूह कूह करती है
कहीं भँवरे पुष्पों पर 
गुंजार करते हैं
कहीं मयूर नृत्य करते हैं
शीतल मंद सुगंध 
पवन बहती है 
यमुना जी भी हिलोरें लेती हैं
ऐसी आनंदमयी ऋतु छाती है
हर ओर हरियाली होती है
ऐसे सुहाने वन में
वृन्दावन बिहारी खेला करते हैं
अनेक राग गया करते हैं
विभिन्न वाद्य बजाय करते हैं
पशु पक्षियों की बोलियों में
आननद बरसाया करते हैं
कभी वंशी की धुन पर 
धेनु चराया करते हैं
ऐसे ही एक दिन 
कंस का भेजा राक्षस प्रलंब
ग्वाल रूप धारण कर आया था
और गोप ग्वालों में ही हिल मिल गया था
बल गोपा ना जान  पाए
पर मोहन से कौन बच पाए
इशारों में बलराम जी को दिखलाया है
और नैनों में ही समझा दिया है
ग्वाल रूप रखकर आया है
ऐसे नहीं मार सकता
जब निजस्वरूप में आ जाए
तब ही वध  करना होगा 
इतना समझा उसे अपने पास बुलाया है 
और हँसते हुए समझाया है 
पर मेरे सखा
मुझसे कपट नहीं करते हैं
और जो कपट करें
उन्हें सखा नहीं मानता हूँ
फिर कान्हा ने 
दो दल बना डाले
आधे ग्वालबाल प्रलंबासुर को
और आधे बलराम जी को दे
फल बुझौवल खेलने लगे
जब फल ना बूझेगा 
वो दूसरे दल के ग्वाल बाल को
अपनी पीठ पर चढ़ा
माण्डीर वन तक जायेगा
जब कान्हा हार गए तब
श्यामसुंदर ने श्रीदामा को
पीठ पर चढ़ाया है
और प्रलंबासुर ने बलराम जी को
पीठ पर उठाया है 
सारे ग्वाल इसी प्रकार 
एक दूजे को उठा चलने लगे
मगर प्रलंबासुर  ना रुका
वो बलराम  जी को ले
आगे बढ़ चला
अब बलरामजी ने अपना भार बढाया है
जिससे प्रलंबासुर घबराया है
और निजस्वरूप में आया है
भार उठाने में अस्र्मार्थ
प्रलंबासुर गिर गया 
बलराम जी ने उसके
सिर पर इक मुक्का मारा है
और वहीं उसका काम तमाम किया है
ग्वालबालों ने आनंद मनाया है



जब ग्वालबाल क्रीडा मग्न हुए
तब गैया चरती हुई दूर निकल गयीं
जब उनका पता ना किसी ने पाया
तब मनमोहन ने बंसी को बजा्या
जिसे सुन सुन गैया रंभाने लगीं
बड़े वेग से मोहन की तरफ आने लगीं
जैसे नदियाँ बड़े वेग से
सागर को जाती हों
उसी समय कंस का भेजा राक्षस 
वन में आया था 
अपनी माया से आंधी चलायी
घोर अँधियारा छा गया 
तब वन में आग लगा डाली
जिससे ग्वाल बाल गायें जलने लगीं
और मनमोहन को पुकारने लगे
हे कृष्ण हे माधव हमें बचाओ
आपके सिवा ना दूजा कोई सहा्यी है 
हर संकट में सिर्फ
तुमने ही जाना बचायी है
तब कान्हा बोल उठे
अपनी आंखें बंद करो
जब सबने आँख बंद कीं
तब अग्नि को प्रभु ने 
मुख से पी लिया
इसका भी गुनीजनों ने 
ये कारण दिया
जो भी प्रभु  को प्रेम सहित
कुछ भी अर्पित करता है
वो उसका भोग लगाते हैं
जब अग्नि के मन में 
ये लालसा आई तभी
उसने स्वयं ही मानो
मोहन के मुख में प्रवेश किया
या शायद प्रभु ने
अपनी त्रितापनाश स्वरुप का दर्शन दिया 
विषाग्नि, मुन्जाग्नी, दावाग्नि 
तीनों अग्नि उन्ही में समायी है
शायद यही बात बतलाई है
पहले रात्रि में अग्नि पान किया 
अब दिन में 
शायद ये दिखलाया है
भक्तों के लिए हमेशा
प्रभु तत्पर रहते हैं
रात और दिन नहीं देखते हैं
पर योगमाया के प्रताप से
ये भेद किसी ने ना जाना
संध्या समय सभी ने
प्रभु संग वृन्दावन में प्रवेश किया
कान्हा ने मनमोहिनी बंसी बजायी
जिसे सुन ब्रजबाला चली आयीं
कान्हा का दर्शन कर 
नयनों को ठंडक पहुंचाई
और घर जा व्रत का पारण किया
गोपियों ने नियम बनाया था
सुबह से शाम तक 
व्रत किया करती थीं
प्रभु दर्शन करके ही
संध्या को पारण करती थीं
यूँ ही नहीं मोहन मिले थे उन्हें
यूँ नहीं प्रेम का दूजा स्वरुप उन्हें कहा गया
जन्मों की तपस्या का फल था मोहन से मिलना
और अब भी योगिनियों सा जीवन जीती थीं 
मोहन को ही सबकुछ समझती थीं 
कान्हा की साँवली सुरतिया पर तो 
गोपियाँ मोहित होती थीं
मोहन प्यारे को देखे बिना
अकुलाई सी फिरती थीं
पानी भरने दही बेचने के बहानों से
अपने प्यारे के दर्शन कर 
ह्रदय तपन मिटाती थीं
मोहन प्यारे की मधुर चितवन 
ही उन्हें सुहाती थी


क्रमश:………

मंगलवार, 15 मई 2012

कृष्ण लीला ………भाग 48




इधर कन्हैया कालिय के
मस्तक पर विराजते
जल के ऊपर आते थे
उधर बलभद्र जी मैया को समझाते थे
धैर्य धारण करो मैया
प्राणप्यारे अभी आते हैं
मगर ब्रजवासी ठौर नही पाते हैं
रुदन किये जाते हैं
मैया खुद को कोसती है
मेरा लाला डूबे और मै जीती रहूँ
मेरे जीवन को धिक्कार है
इधर नन्दबाबा मूर्छित हो गिर पडे
तब बलराम जी उन्हे चेत कराते हैं
और समझाते हैं
तभी यमुना में लहरें शोर करने लगीं
और बलभद्र जी बोल उठे
देखो कान्हा आता है
सभी उन्हें देखने को 
व्याकुल हो उठे 
इधर मोहन कालिया के 
मस्तक पर बंसी बजाते
जल के ऊपर आये
जिसे देख मैया बाबा और ब्रज वासी हर्षाये
प्रभु को उतार कालिया ने
रानियों सहित प्रणाम कर
रमणक द्वीप को प्रस्थान किया
उसी दिन से यमुना का 
विषतुल्य जल अमृतसम हुआ 




जब नंद् ने कमल फूल 
कंस को भिजवाए
उसे देख कंस का विश्वास दृढ हुआ
ये बालक ही मेरा काल है
अब ना प्राण बचेंगे
ये सोच कंस के प्राण सूख गए
धुंधक राक्षस को अब कार्य सौंप दिया
जाकर सब ब्रज वासियों को जला डालो
थके हारे ब्रजवासी
यमुना किनारे सोये थे
धुंधक ने आग चारों तरफ लगा दी
पशु पक्षी जलने लगे
देख ब्रजवासी घबरा गए
और कान्हा की शरण में आ गए 
ये देख कान्हा बोले
सब आँखें बंद करो
और अग्नि को अपने मुखे में रख शांत किया
यूँ सोचा सबका डाह दूर करने के लिए 
मैं जन्म लिया
अब यही मेरा कर्त्तव्य है
या शायद ये सोचा 
रामावतार में जानकी को सुरक्षित रख
अग्नि ने उपकार किया था 
आज उसे अपने मुख में रख सत्कार किया है
या शायद ये कारण होगा
कार्य का कारण में लय होता है
अर्थात मुख से अग्नि का प्रगटीकरण हुआ
तो मुख में ही उसका लय होना जरूरी था
या शायद
मुख में अग्नि शांत कर 
ये सन्देश दिया
भाव दावाग्नि को शांत करने के लिए
भगवान का मुख ब्राह्मन कहाते हैं
बिन पानी सब शांत हुआ 
तब ब्रजवासियों ने नेत्र खोल लिया
सब अचरज करने लगे
तब केशवमूर्ति बोल पड़े
जंगल  की आग जल्दी लगती है
वैसे ही बुझ जाती है
उन पर अपनी माया डाली है 
सबको यों ही लगा 
आग अपने आप बुझ गयी
सभी मंगलाचार करने लगे
और श्याम प्यारे संग झूमने लगे 
यूं मोहन सबका योगक्षेम वहन करते हैं 
जिन्होने स्वंय को उनके चर्णारविन्द मे समर्पित किया 



क्रमश: …………




बुधवार, 9 मई 2012

कृष्ण लीला ……भाग 47





ब्रह्मा के पुत्र कश्यप की
कद्रु विनता नाम की दो रानियाँ थीं
कद्रु के कालीनाग सर्प
और विनता के
गरुड और सूर्य के सारथि अरुण
नामक दो पुत्र हुये
दोनो सवति मे एक दिन ये बात हुई
सूर्य के रथ मे
किस रंग के है घोडे जुते
विनता ने श्वेतवर्ण और कद्रु ने
स्यामवर्ण बतलाये
झगडा होने पर प्रतिज्ञा कर डाली
झूठ बोलने वाली सच बोलने वाली की दासी होगी
जब सर्पों  को पता चला
अपना माथा पीट लिया
माता पहले हमसे तो पूछा होता
इतना सुन कद्रु बोली
कोई तिकडम अब तुम ऐसी लडाओ
जिससे मेरा कहना सच हो जाये
और विनता मेरी दासी बन जाये
तब सर्प घोडों के अंगों से जा लिपटे
जिसे देख विनता के पसीने छूटे
जब गरुड को पता चला
तब सर्पों की माता से ये कहा
तुमने छल बल से मेरी
माता को धोखा दिया
पर माता को दासी मत बनाओ
उसके बदले जो चाहे ले जाओ
इतना सुन सर्पों ने
अमृत कलश लाने की मांग करी
गरुड जी ने लाकर कलश दिया
ये देख देवताओं मे
खलबली मच गयी
अगर सर्पों ने अमृत पिया
कोई ना जीता रह पायेगा
ये सोच गरुड जी से विनय किया
जैसे धोखे से उन्होने
तुम्हारी माता को भुलावा दिया
वैसा ही मार्ग अब तुम भी अपनाना
पर अमृत कलश वापस ले आना
जब सर्प अमृत पीने से पहले
स्नान करने तालाब मे घुसे
गरुड जी कलश ले उड चले
जाकर कलश देवताओं को दिया
मगर दोनो मे शत्रुता का बीज पड गया
नारायण प्रभु से गरुड ने वरदान पाया
सर्पों के भय से खुद को मुक्त पाया
मगर दोनों  में वैर था पनपा 
इसी कारण
पूर्व काल मे सर्पों ने
नियम बनाया था
प्रत्येक अमावस्या को
हर परिवार से
एक सर्प की भेंट
गरुड को दी जाये
कद्रु और विनता मे
जन्मो से वैर पनपा था
इसी वैर के कारण
जो भी मिलता
उसी सर्प को गरुड जी खा जाते थे
तब व्याकुल हो सर्प
ब्रह्मा शरण मे आये
तब ब्रह्मा ने ये नियम बनाये
प्रत्येक अमावस्या सर्प परिवार
अपनी बारी पर सर्प भेंट करेगा
पर जब कालिय की बारी आई
घमंड और गर्व से
ना फ़ूला समाता था
बलि देना तो दूर
जो सर्प गरुड की भेंट
चढाये जाते थे
उन्हे भी खा जाता था
ये देख गरुड को क्रोध आ गया
कालिय को मारने के लिये
बडे वेग से प्रहार किया
कालिय ने अपने सौ फ़णों से
गरुड पर प्रहार किया
कालिय की ढिठाई देख
विष्णु वाहन गरुड  ने भी
कडे प्रहार किये
जिससे कालिय व्याकुल हुआ
और बडे वेग से
भागता यमुना के कुण्ड मे छुप गया
इसी स्थान पर एक दिन
क्षुधातुर गरुड ने
सौभरि ॠषि के मना करने पर भी
मस्त्यराज को खा लिया
ये देख सभी मछलियों को बडा कष्ट हुआ
दीन हीन व्याकुल हो
मुनि से प्रार्थना की
उनकी दशा देख
सौभरि ने गरुड को शाप दिया
यदि फिर तुम इस कुण्ड की
मछलियाँ खाओगे
तत्क्षण प्राणों से हाथ धो बैठोगे
ये बात कालिय को पता थी
इसी कारण आकर यहाँ शरण ली थी
इस तरह शुकदेव जी ने
ये रहस्य उदघाटित किया

क्रमश: ………

रविवार, 29 अप्रैल 2012

कृष्ण लीला .........भाग 46




कालिय के सौ सिर थे
जिसे भी ना वो झुकाता था
उसी को प्रभु अपने पैरों से कुचलते थे
उसके मुख और सिर से
खून निकलता था
जो कान्हा के चरणों पर
लहू की बूंदें पडती थीं
ऐसा लगता मानो
रक्त पुष्पों से पूजा की जा रही हो
प्रभु के इस अद्भुत
ताण्डव रूप नृत्य से
जालिम के फ़णरूप छत्ते
छिन्न भिन्न जब हो गये
हर अंग चूर चूर हो गया
मूँह से खून की उल्टी होने लगी
तब उसे जगतपति प्रभु की स्मृति हुई
वह मन ही मन प्रभु की शरण गया
अपने पति की दशा देख नागपत्नी
बच्चों सहित प्रभु के चरणों मे गिर गयी
हाथ जोड प्रभु को प्रणाम किया
और कालिय को छोडने की
विनती करने लगी
इधर कालियनाग को
बैकुण्ठनाथ के दर्शन और स्पर्श से
ज्ञान उत्पन्न हुआ
और ब्रह्मा की बात का स्मरण हुआ
ब्रज गोकुल मे कृष्णावतार होगा
सो ये वो ही जान पडते हैं
दूसरे की क्या सामर्थ्य जो
मेरे विष से बच जाये
ये सोच कालिया नाग
अपने कृत्य पर लज्जित हुआ
मैने आपको ना पहिचाना
मुझ अधम दीन को
अब अपनी शरण मे लीजिये
इतना कह लज्जावश स्तुति ना कर सका
जब प्रभु ने देखा
कालिय का अभिमान है छूटा
तब अपने चतुर्भुज रूप का है दर्शन दिया
ये देख कालिय नाग की पत्नियाँ
विलाप करने लगीं
और प्रभु से निवेदन करने लगीं
प्रभु आप समस्त जगत के नियन्ता हैं
पापियों को मारने और
अधर्म का नाश करने के लिये
आपने निज इच्छा से है अवतार लिया
जो कोई तुम्हारी भक्ति करता
या शत्रुता से तुम्हारा ध्यान धरता
वो भी भव से है पार उतरता
जैसे अमृत को जान कर पिया जाये
या अनजाने मे
अमर ही बनाता है
वैसे ही तुम्हारा ध्यान
जीव का है कल्याण करता
जिन चरणों का ध्यान
जप –तप ,यज्ञ,दान से भी नही मिलता
उनका दर्शन सहज मे पाया है
आज हमारा भाग्य उदय हो आया है
आपने अभिमानी का दभ चूर किया है
पर ना जाने इसने ऐसा कौन सा
पुण्य किया है
जिन चरणों की सेवा को
लक्ष्मी भी तरसती है
आज उन्ही चरणों की रज
इसे मिली है
इसके समान बडभाती कौन होगा
सर्पयोनि पाकर भी
प्रभु दर्श किया
जिस चरण रज की महिमा
नारद , सनकादिक ,इन्द्रादि गाते हैं
और नित्य उसी मे वास करते हैं
उस समान तीनो लोक की
सम्पदा भी तुच्छ समझते हैं
आज इसने वो पारस पाया है
पर इसके दोष माफ़ करो
प्रभु इसको अभयदान दे, कृतार्थ करो
हम अबला शरण तिहारी हैं
स्तुति सुन कान्हा क्षमा कर
मस्तक से कूद पडे
तब कालिय को कुछ होश आया
और कर जोड विनय करने लगा
मेरा अपराध क्षमा करो
मै तामसी वृत्ति प्राणी हूँ
कैसे तुम्हारा भेद पाता
जब देवता ॠषि मुनि पार ना पाते हैं
मै मूर्ख कैसे तुम्हे पहचानता
आपने ही जातिगत मेरा स्वभाव बनाया है
जैसे गौ घास खाने पर दूध देती है
वैसे ही मै दूध पीने पर
ज़हर उगलता हूँ
ये मेरा स्वभाव आपका ही बनाया है
और स्वभाववश अनजाने ही
मैने आप पर फ़ण चलाया है
पर मेरा अपराध क्षमा कीजिये
मुझे अब अपनी शरण मे लीजिये
जिन चरणों को लक्ष्मी ह्रदय मे धारण करती हैं
देवता ध्यान लगाते हैं
गंगा जिनकी धोवन है
वो चरण कमल आज
मेरे सिर पर विराजे हैं
मेरे जन्मो के सब पाप ताप मिट गये हैं
जो शेषनाग इतनी बडाई पाता है
जब आप उस पर शयन करते हैं
पर मेरे शीश पर आपने जो नृत्य किया
अब अपने बराबर पुण्यभागी
मै किसी को ना समझता हूँ
अब मेरा सब डर छूट गया
स्तुति सुन श्यामसुन्दर ने कहा
अब तुम कालीदह छोड
रमणक द्वीप मे वास करो
यहाँ मै जलक्रीडा करूँगा
महाप्रलय तक तेरा नाम स्थिर रहेगा
जो तेरी मेरी कथा सुनेगा
उसे ना साँप काटे का भय रहेगा
अब जल्दी से एक करोड कमल के फूल लाकर दो
डरते काँपते कालिय नाग ने निवेदन किया
प्रभु फूल तो अभी पहुँचा देता हूँ
पर रमणक द्वीप मे जाने से डरता हूँ
वहाँ गरुड जी मुझे खा जायेंगे
उन्हीके डर से तो यहाँ मै आया हूँ
इतना सुन प्रभु बोल पडे
अब तुम निर्भय रहो
गरुड ना तुम्हारा कुछ बिगाडेगा
मेरे चरणचिन्ह देख
तुम्हारे मस्तक पर
प्रणाम कर चला जायेगा
इतना कह प्रभु ने उसे अभयदान दिया
तब कालिये ने हर्ष सहित
पत्नि सहित विधिपूर्वक
प्रभु का पूजन किया
रत्न मणियाँ भेंट चढाईं
तीन करोड कमल के फूल
अपने ऊपर लाद लिये
इतना सुन परिक्षित ने पूछा
कालिय नाग ने कौन सा
ऐसा अपराध किया
जो रमणक द्वीप छोड
गरुड भय से यमुना मे वास किया
तब शुकदेव जी बतलाने लगे



क्रमशः .........