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सोमवार, 19 जुलाई 2010

शिकार

मोहन और उर्मिला आज बहुत खुश थे . ख़ुशी के मारे पाँव जमीन पर नहीं पड़ रहे थे और हों भी क्यूँ ना आज उनके इकलौते बेटे राहुल की शादी जो थी. अच्छे पैसे वाले रईस लोगों में शुमार था मोहन का मगर फिर भी ज़मीन से जुड़े रहे . कभी पैसे का दिखावा तो उन्होंने किया ही नहीं और ना ही ज्यादा लाड- प्यार कर इकलौते बेटे को बिगड़ने दिया. इसी वजह से आज राहुल का अच्छा- खासा कारोबार था . एक सभ्य ,सुशिक्षित बेटे पर किस माँ -को नाज़ ना होगा. उर्मिला और मोहन की सिर्फ एक ही इच्छा थी कि राहुल के लिए दुल्हन ऐसी लायें जिसे जो देखे तो बस देखता ही रह जाये फिर चाहे वो गरीब घर की ही क्यूँ ना हो.और आज उनका ये अरमान पूरा होने जा रहा था. उन्होंने गरीब घर की एक सुशिक्षित और सुन्दर कन्या का चुनाव किया था  और राहुल की स्वीकृति मिल जाने पर उनका विवाह कर दिया.
एक हँसती- मुस्कुराती बगिया बन चुका था मोहन का घर .हर कोने में खुशियों ने अपना साम्राज्य बनाया हुआ था . हर पल घर में से हंसी के फव्वारे फूटा करते थे ..........देखने वाले रश्क किया करते थे मोहन की किस्मत पर . एक साल कब पंख लगाकर उड़ गए पता ही ना चला और इसी बीच मोहन और उर्मिला दादा -बन गए एक फूल सी कोमल पोती के.उनकी दुनिया तो सिर्फ अब पोती में ही सिमट गयीं और राहुल कारोबार में लगा ही था तथा घर की हर सुख -सुविधा का ध्यान रखता.घर की, धन -दौलत की सारी जिम्मेदारी रेनू को सौंप कर मोहन और उर्मिला निश्चिन्त हो गए. 
मगर शायद नियति को इतनी खुशियाँ मंजूर ना थी. एक अनहोनी कब से बाँह पसार रही थी उन्हें पता ही ना था. धीरे -धीरे उनके घर को दीमक की तरह चाट रही थी इसका किसी को अहसास भी ना था. एक दिन अचानक रेनू घर से गायब हो गयीं .अपना सारा सामान लेकर चुपचाप अपने मायके चली गयीं बिना किसी को कुछ बताये. जब ढूँढने पर पता चला तो राहुल ने उसे लाना चाहा मगर आज का सदमा तो अप्रत्याशित था. रेनू ने आने से इंकार कर दिया. राहुल को समझ नहीं आ रहा था कि उसका क्या कसूर है जो रेनू नहीं आ रही है. घर जाकर माँ -बाप को सारी बात बताई और जब वो उसे लेने आये तो भी रेनू टस से मस नहीं हुई वो तो अपनी बेटी को भी अपने साथ नहीं लायी थी. दादा -दादी के पास ही छोड़ आई थी. ना जाने कैसी पत्थर दिल की थी कि बच्चे की ममता भी उसे वापस आने को मजबूर नहीं कर पा रही थी.अभी तक तो घर में किसी को पता  ही नहीं था कि रेनू क्या ले गयी और क्या नहीं जब घर में देखा तो पता चला कि रेनू तो अपने साथ सारे जेवर और लाखों रुपया नकद भी ले गई है. सबने काफी समझाना चाहा मगर वो नहीं मानी ना ही ये समझ आ रहा था कि उसे किस बात की कमी थी घर में जो उसने ये कदम उठाया .सब उसी का तो था.
 ये बात ऐसी तो थी नहीं कि छुपायी जा सके सारे में फ़ैल गई बहुत ही जल्दी इसलिए बिरादरी के लोगो ने भी समझाना चाहा मगर रेनू ने किसी की भी नहीं सुनी वो तो बस अब अलग ही रहना चाहती थी. साथ ही वो राहुल को छोड़ने की एवज में राहुल की संपत्ति का आधा हिस्सा अपने नाम चाहती थी. जब कोई कारण पूछता तो बस एक ही जवाब देती  कि उसकी अपने पतिऔर सास ससुर से बनती नहीं है इसलिए वो अब उनके साथ नहीं रह सकती. वो लोग दकियानूसी ख्यालों के हैं. उसे बात -बात पर टोकते हैं. उसकी आज़ादी पर प्रतिबन्ध लगाते हैं. वो अपनी इच्छा से घर में कुछ भी नहीं कर सकती बस कोई आ जाये तो उनके आगे बड़े ही मीठे बनते हैं और ऐसा दिखावा करते हैं जैसे उनसे ज्यादा तो बहू का ख्याल रखने वाला कोई है ही नहीं मगर बाद में उसे बहुत तंग करते हैं. ना जाने ऐसे कितने ही लांछन लगा दिए रेनू ने राहुल और उसके माता- पिता पर. एक शर्मदार व्यक्ति के लिए तो ये डूब मरने वाली बात हुई और फिर मोहन जैसे इंसान के लिए तो ऐसा लगा जैसे किसी ने भरे बाज़ार में उसके कपडे उतार दिए हों.
जब किसी तरह भी बात नहीं बनी तो उसे बच्ची का वास्ता दिया गया.शायद इसी बहाने वो अपनी जिद छोड़ दे मगर रेनू ने कहा कि बच्ची के नाम यदि वो लोग १ करोड़ रुपया अलग से कर दें तो ही वो उसे अपने पास रखेगी.ये सुनकर तो सबको बेहद आश्चर्य और दुःख हुआ कि उसमें तो माँ की ममता ही नहीं है तभी एक दूधमूही  बच्ची का भी सौदा कर रही है.
राहुल और उसके माता- पिता को जब दिख गया कि रेनू किसी भी तरह नहीं मानेगी तब उन्होंने बीच में कुछ लोगो को डालकर फैसला करने की  सोची और फिर रेनू राहुल से ५ करोड़ रूपये लेकर अलग हुई.कोर्ट कचहरी के चक्कर में वो पड़ना नही चाहते थे क्यूँकि जानते थे कि उसमे तो उनके बेटे का जीवन ही तबाह हो जाएगा और वो फिर इस हादसे से उबर नहीं पायेगा क्यूँकि जब उनके लिए ही ये घटना अप्रत्याशित थी तो राहुल पर तो गुजरी थी इसलिए उन्होंने आपस में ही मामले को सुलझाना चाहा .


राहुल और उसके माता पिता बेहद हताश हो गए . सारे समाज में उनकी इज्ज़त पर रेनू नाम का दाग लग गया था. मगर रेनू को इस सब की कोई फिक्र नहीं थी वो और उसके माता पिता ने वो शहर ही छोड़ दिया और किसी दूसरे शहर में ऐशो आराम से रहने लगे.५ करोड़ रूपये मिले थे इसलिए उनके पैर ज़मीन पर नहीं पड़ रहे थे . २ साल में ही पैसा ख़तम होने की कगार पार पहुँच गया तो रेनू और उसके माँ बाप फिर एक नए शिकार की तलाश में निकल पड़े क्यूँकि उनका तो धंधा ही यही था--------हर बार नए शहर में नया मुर्गा काटते थे.

19 टिप्‍पणियां:

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

कहानी में समाज की विकृतियों का अच्छे ढंग से चित्रण किया गया है!

kshama ने कहा…

Kathanak to sashakt hai...aise log khush kaise rah pate honge?

Himanshu Mohan ने कहा…

कथा अच्छी है, मैं तो कहूँगा कि वास्तविकता के क़रीब है क्योंकि ऐसी घटनाएँ होती हैं और पता भी चलती हैं, मगर लोग चुप रह जाते हैं। दबे-ढके चर्चा हो भी तो स्त्री पक्ष को सहानुभूतिजन्य लाभ अवश्य मिलता है।
कथा के शिल्प के तौर पर मैं यह ज़रूर कहूँगा कि सपाटबयानी का शिकार होकर प्रभावहीनता की हद तक पहुँच रही है यह कहानी। सच और गल्प में फ़र्क करना ज़रूरी है - और इसीलिए मसाले डालना ज़रूरी है कि सर्वग्राह्यता बनी रहे, रोचकता उत्पन्न हो।
कोई न कोई वजह ज़रूरी है रेनू के इस अप्रत्याशित व्यवहार के पीछे - कोई भी बात संसार में निरुद्देश्य नहीं होती। उद्देश्य का होना और उसका महत्व समझ में आ सके - ये ज़रूरी है पाठकों की रुचि के लिए।
बाक़ी मैं लेखक तो हूँ नहीं - सो आधिकारिक तौर पर कुछ नहीं कह सकता।
अच्छे प्रयास के लिए साधुवाद!

महेन्द्र मिश्र ने कहा…

मै तो कहूँगा ... समाज में तरह तरह के व्यक्ति मिलते हैं जिनका चरित्र एकसा नहीं होता है ... दुनिया में ऐसे भी भ्रष्ट मक्कार लोग होते हैं जो भोले भले लोगों का सब कुछ लूट लेते हैं ... कहानी का सार भी ऐसे लोगों के चरित्र को उभार रहा है. .. बहुत बढ़िया .. बढ़िया कहानी रचना है ...

सुरेन्द्र "मुल्हिद" ने कहा…

ati manmohak kahaani hai vandana ji...sach ka varnan bahut hee achey dhang se kiya hai aapne!

राकेश कुमार ने कहा…

कहानी मे लेखिका द्वारा समाज के बदलते स्वरूप पर प्रकाश डालने की चेष्टा की गयी है, सचमुच यह विडम्बना है कि समाज का एक कटु सत्य बदलते हुये परिवेश मे जो उभरकर सामने आ रहा है वह है स्त्री का सवेदना हीन स्वरूप, उसकी ममता, कोमल भावनाये भौतिकवाद की इस अन्धी दौड के मध्य जैसे दबकर अन्तिम सास लेने व्यग्र हो रही है, सम्पूर्ण सामाजिक सरचना एक बदलाव के दौर से गुजर रही है जिसमे स्त्रियोचित गुणो का अभाव हर तबके और समाज के बीच देखा जा सकता है, वर्गभेद और उन्च नीच से परे स्त्रियो के व्यक्तित्व मे होने वाला परिवर्तन समाज के लिये अशुभ सन्केत है, स्त्री के इस बदलते स्वरूप को कही यही नही रोका गया तो भारतीय समाज और पाश्चात्य समाज के बीच फर्क करना मुश्किल हो जायेगा, अहिल्या और सावित्री की धरती एक बार फिर से कलन्कित ना हो जाये इस बात की ओर लेखिका इशारा करना चाहती है, वह पाठको के मध्य इस छोटी सी कहानी मे कई सवाल छोड जा रही है , जिनके जवाब हमे आने वाले वर्षो मे तालाशने होन्गे. Rakesh

rashmi ravija ने कहा…

बिकुल यथार्थवादी कहानी , ऐसी घटनाएं होती रहती है ,समाज में और ऐसी औरतें भी होती हैं..चाहे सुन कर कितना भी बुरा लगे पर ये सच है...
बहुत अच्छी कहानी, है सत्य का विकृत रूप दिखाती हुई

shikha varshney ने कहा…

yatharthvadee kahani .

रवि कान्त शर्मा ने कहा…

वन्दना जी, आपने समाज का एक चेहरा सुन्दर शब्दों में बयाँ किया है। ऎसा तो हमेशा से होता आया है और होता ही रहेगा। वही मनुष्य बुद्धिमान होता है जो अपने धन की हानि को, अपने मन के दुःख को, अपने घर के झगड़ों को, अपने साथ हुए धोखे को और अपने अपमान को किसी को नही बताता है। प्रत्येक मनुष्य को प्रारब्ध (पूर्व जन्मों के कर्म) के अनुसार जो प्राप्त होना होता है, वही प्राप्त होता है।

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

कटु सत्य को उजागर करती सटीक कहानी....आज समाज में जो ना हो जाये वो थोड़ा ....क्या रेनू को यह नहीं मालूम था की सारा कुछ तो उसी का है...फिर ५ करोड उसको क्यों लालची बना गए?? बस यही समझ आया कि यह उसका धंधा था....लेकिन यदि धंधा था तो बेटी को क्यों जन्म दिया...?
जो भी हो कथानक सटीक है और ऐसी घटनाओं को सत्य की कसौटी पर बता रहा है...

अजय कुमार ने कहा…

ये तो विस्वासघात है ।

राजेश उत्‍साही ने कहा…

वंदना जी की कहानी के बारे में कई बातें कही गई हैं। मैं इन्हीं बातों को थोड़ा और खोल के कहना चाहता हूं।
कथा और सत्यकथा में अंतर होता है। दोनों के अपने मापदंड हैं। जहां कथा विवरणों के साथ भावनात्मक और वैचारिक द्वंद्व लेकर चलती है वहीं सत्यकथा में केवल विवरण मात्र होते हैं। संयोग से प्रस्तुत रचना दोनों ही श्रेणियों में नहीं आती।
अगर हम इसे सत्यकथा भी मान लें तो इसमें इतने झोल हैं कि इसकी सत्यतता पर विश्वास नहीं होता। या यूं कह सकते हैं जानकारी की कमी है। मसलन यह बात गले नहीं उतरती कि
रेणु के साथ ऐसा क्या घटा था कि वह साल भर तक अच्छी भली रही और फिर अचानक छोड़कर चली गई? ऐसी कौन सी बात थी कि जिसके लिए राहुल और उसके मां बाप पांच करोड़ रूपए देकर समझौता करने के लिए तैयार हो गए? समझौते की जरूरत आखिर क्यों पड़ी? समझौता नहीं करते तो क्या होता?
मुकदमेबाजी अगर होती तो कौन करता? किस का पक्ष कमजोर था? राहुल तो साधन संपन्न‍ था। राहुल तो रेणु से अलग नहीं होना चाहता था, फिर वह मुकदमेबाजी से पीछे क्यों हटा? मुकदमेबाजी से राहुल का जीवन कैसे बरबाद होता? ऐसे केस तो पहले फैमली कोर्ट में ही जाते हैं जहां बिना किसी मुकदमेबाजी के समझाइस दी जाती है।
यह बात भी गले नहीं उतरती कि पांच करोड़ बहुत बड़ी रकम है। अगर कोई उसे बैंक में भी रखे तो उसके ब्याज से आराम से अपना जीवन गुजार सकता है। इसलिए उसे खर्च करके वे किसी और शिकार की तलाश में निकल पड़े। रेणु और उसके मां बाप अगर यही करना चाहते थे तो वे तो रेणु के घर में रहकर भी कर सकते थे। और राहुल तथा उसके मां बाप को शायद कोई आपत्ति नहीं होती।
अब अगर हम रचना में प्रयुक्त किए शब्दों और विशेषणों पर गौर करें। सबसे पहले इस पंक्ति पर गौर करें - दुल्हन ऐसी लायें जिसे जो देखे तो बस देखता ही रह जाये- । यह पंक्ति राहुल के मां-बाप की सोच बताती है। यानी वे सुंदरता को बहुत अहमियत देते हैं। क्यों । यह एक सभ्य और सुशिक्षित समाज की समझ नहीं है।
इस वाक्य पर विचार करिए- वो गरीब घर की ही क्यूँ ना हो- यहां गरीबी को एक कमतर गुण के रूप में देखा जा रहा है। या यह वाक्यर देखें - उन्होंने गरीब घर की एक सुशिक्षित और सुन्दर कन्या का चुनाव किया था- यहां यह सवाल भी उठने लगता है कि आखिर राहुल के मां-बाप की सुशिक्षित शब्द की परिभाषा आखिर क्या थी।

राजेश उत्‍साही ने कहा…

वंदना जी की एक अन्‍य रचना में उन्‍होंने लिंगभेद की बात उठाई थी। य‍ह विडम्‍बना ही कही जा सकती है कि उनकी इस कहानी पर टिप्‍पणी करते हुए राकेशकुमार जी केवल स्त्रियों को ही दोषी ठहरा रहे हैं। वे समाज में केवल स्त्रियोचित गुणों का अभाव ही देख रहे हैं। यह फिर एक बार लिंगभेद की बात है। वास्‍तव में जिन गुणों की समाज को जरूरत है वे मानवीय गुण हैं न कि पुरुषोचित या स्त्रियोचित। उम्‍मीद है राकेश जी अपने विचारों पर फिर से विचार करेंगे।

PRAN SHARMA ने कहा…

VANDANAA JEE, ACHCHHEE KAUSHISH
HAI.LIKHTE RAHIYE AUR LEKHNI MEIN
NIKHAAR LAATE RAHIYE.AAPMEIN
RACHANATMAK PRATIBHA HAI.SHUBH
KAMNAAON KE SAATH

सलीम ख़ान ने कहा…

तो रेनू और उसके माँ बाप फिर एक नए शिकार की तलाश में निकल पड़े क्यूँकि उनका तो धंधा ही यही था--------हर बार नए शहर में नया मुर्गा काटते थे.

Babli ने कहा…

बहुत ही सुन्दर और मनमोहक कहानी लिखा है आपने! बढ़िया लगा!

योगेन्द्र पाल ने कहा…

I like the story.

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raj ने कहा…

yah sach he ise kise hote hi bouth acchi khani hi nahi shici bath hi ,bauth accha laga.

raj shekhar ने कहा…

yah sach he ise kise hote hi bouth acchi khani hi nahi shici bath hi ,bauth accha laga.